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बेच दिया पूरा-का-पूरा गांव

अमरपुर (कीटखेड़ी) । भोपाल से करीब 45 किमी दूर सिरोंज रोड पर बसे अमरपुर (कीटखेड़ी) गांव को कुछ लोगों ने नियम विरुद्ध तरीके से बेच दिया है, वह भी सिर्फ 5 लाख रुपए में। मजेदार बात तो यह है कि खरीददार गांव की सीमा में आने वाले सरकारी स्कूल, सड़क, कुएं और हैंडपंप पर भी अधिकार जमा रहे हैं। उन्होंने गांव वालों से कह दिया है कि हमने इस गांव को खरीद लिया है, अब यहां हमारा अधिकार है। पांच एकड़ भूमि पर बसा अमरपुर (कीटखेड़ी) गांव 70 साल पुराना है और यहां करीब 300 लोग रहते हैं। वर्ष 1985 में सिविल कोर्ट बैरसिया ने गांव की इस भूमि को सार्वजनिक घोषित किया था। इसके बावजूद गांव का सौदा हो गया। ऐसे में ग्रामीणों ने पटवारी और तहसीलदार पर जमीन खरीदने वालों के साथ मिलीभगत के आरोप लगाए हैं। डीबी स्टार टीम ने जब मौके पर जाकर देखा तो पाया कि पूरा गांव ही इस बात से परेशान है कि 70 साल से बसा गांव एक झटके में कैसे बिक गया? हालांकि ग्रामीणों ने इसकी शिकायत कलेक्टर की जनसुनवाई में की, लेकिन क्या कार्रवाई हुई कुछ पता नहीं चला।पता चला कि तीन भाइयों अमानसिंह, देवाकश और भागचंद प्रजापति ने मिलकर 70 साल पहले यह गांव बसाया था। भागचंद परिवार में बड़े थे, इसलिए जमीन उनके नाम पर रही। लेकिन उनके निधन के बाद यह जमीन उनके चारों बेटों हरगोविंद, मोहरसिंह, कमलसिंह और मोहनलाल के नाम अपने आप हो गई। इसी का फायदा उठाकर इन चारों ने मार्च २क्११ में ३ एकड़ जमीन फूलाबाई को और अप्रैल 2011 में 2 एकड़ जमीन मोहम्मद सादिक मंसूरी को कृषि भूमि बताकर बेच दी। 15 दिन पहले मो. सादिक गांव में पटवारी कोमलसिंह को लेकर पहुंचे और अपनी जमीन का सीमांकन करने लगे। तब जाकर गांव वालों का पता चला कि उनका गांव बेच दिया गया है। 31 मई 2011 को कीटखेड़ी के सरपंच रामवीर और अन्य ग्रामीणों ने कलेक्टर को जनसुनवाई में इसकी शिकायत की कि कुछ लोग गांव को बेचने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर कलेक्टर ने 15 दिन के अंदर एसडीओ बैरसिया से जांच कर कार्रवाई के लिए कहा, लेकिन कलेक्ट्रेट में न तो कोई जवाब पहुंचा और न ही गांव वालों को पता लगा कि शिकायत का क्या हुआ?  गंगाराम प्रजापति, हमारे पिताजी अमानसिंह और उनके बड़े भाई भागचंद ने 70 साल पहले कीटखेड़ी में जमीन खरीदी थी। परिवार का मुखिया होने के नाते यह जमीन भागचंद के नाम पर ही रहने दी। वर्ष 1985 में विवाद हुआ तो सिविल कोर्ट में भागचंद और हमारे पिता अमानसिंह के बीच समझौता हुआ। इसमें स्पष्ट कहा गया कि 5 एकड़ में बसे गांव को सार्वजनिक कार्यो के लिए छोड़ा जाए। बावजूद इसके तहसीलदार, रजिस्ट्रार और दलालों की मिलीभगत से पूरा गांव बेच दिया गया।नवल सिंह प्रजापति,हमारे पास बिजली का बिल आता है और राशन कार्ड भी है। इसके बावजूद इस गांव को कृषि भूमि बताकर बेच दिया और हमें खबर तक नहीं लगी। रामवीर सिंह मैहर, सरपंच, अमरपुर (कीटखेड़ी) शासकीय रिकॉर्ड में यह निजी भूमि के रूप मंे दर्ज है, इसलिए इसे पहले भी बेचने की कोशिश हुई थी। इसकी शिकायत कलेक्टर को जनसुनवाई में पिछले साल भी की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई और गांव बिक गया। 15 दिन पहले पटवारी कोमलसिंह व गांव खरीदने वाले मंसूरी आए और पूरी जमीन की नपती करके चले गए। Source: श्यामसुंदर गोयल
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